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तीन धाराओं के संगम से बना आज का त्रिवेणीधाम

दैनिक दिव्यज्योति

  • हर साल धुलंडी के दूसरे दिन भरता है गंगादास महाराज का मेला
  • यहां विश्व की 108 कुंड की प्रथम पक्की यज्ञशाला

जयपुर। राजस्थान के जयपुर जिले के शाहपुरा के पास तीन धाराओं के संगम से त्रिवेणीधाम बना। देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल इस स्थान पर हर साल धुलंडी के दूसरे दिन गंगादास महाराज का लक्खी मेला भरता है। यह मेला लोक संस्कृति के साथ सामाजिक सौहार्द्र का प्रतीक भी माना जाता है। वैसे तो यह स्थान कई संतों की तपोस्थली रही लेकिन ब्रह्मलीन नारायणदास महाराज ने इस स्थान को देशभर में ख्याति दिलवाई।


भारतवर्ष में यह एक ऐसा स्थान रहा, जहां लगातार लगभग आधी सदी से रामनाम का कीर्तन चल रहा है। इसके साथ ही पदमश्री ब्रह्मलीन नारायणदास महाराज के शिष्य पूरे भारत वर्ष जयपुर, दिल्ली, गुजरात, मुंबई, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों में प्रतिदिन करीब दो घंटे सत्संग करते है। स्व. श्रीनारायणदास जी महाराज ने भारत के जाने-माने तीर्थ स्थानों पर भागवत कथा, रामकथा, यज्ञों का आयोजन किया।

यहां पर विश्व की प्रथम 108 कुंड की पक्की यज्ञशाला है। त्रिवेणी धाम स्थान के दर्शन से ही लोगों की शारीरिक पीड़ाए दूर होती थी। इसके साथ ही महाराज श्री ने कई लोगों को जीवनदान तक दिया था।
त्रिवेणीधाम का संक्षिप्त परिचय:
राजस्थान प्रांत में जयपुर से करीब 80 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर पदिशा में शाहपुरा के पास पर्वतों की अरावली के मध्य त्रिवेणी के तट पर है। श्रीसम्प्रदाय के तहत श्री रामानंद संप्रदाय श्रीखोजी द्वाराचार्य काठिया परिवाराचार्य श्री ब्रह्मदासजी के पौत्र शिष्य श्री भरतदास जी काठिया के शिष्य श्री गंगादासजी महाराज की ओर से स्थापित त्रिवेणीधाम आश्रम है।

श्रीसम्प्रदाय की आद्याचार्य श्रीजी सीताजी है और वे इस संप्रदाय की प्रवर्तिका ऋषि कहलाती है। यह संप्रदाय श्रीजी से प्रारंभ हुआ है और उत्तरोत्तर फला है। इसी संप्रदाय के मध्य श्रीरामानंदाचार्य हुए है। जब आचार्य रामानंदजी का प्रादुर्भाव हुआ, तब इस संप्रदाय का और भी व्यापक प्रचार हुआ।

पद्मश्री नारायणदास जी का परिचय:
श्री नारायणदास जी महाराज का जन्म 17 सितंबर, 1927 में ग्राम चिमनपुरा गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके पिता श्रीरामदयाल शर्मा और माता श्रीमति भूरी बाई थी। नारायणदास जी महाराज का ननिहाल भामोद विराटनगर के हरितवाल परिवार में है।

मां भूरी देवी ने नारायणदास जी को बाबा भगवानदास जी के चरणों में अजर-अमर होने के लिए छोड़ दिया। महाराज श्री त्रिवेणीधाम में विक्रम संवत 2004 में आ गए थे। तब से ही आश्रम का सब कार्यभार देखने लगे। उन्होंने श्रीसद्गुरुदेव के सान्निध्य में कठोर तपस्या की। बारह वर्ष तक ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की धूप में दोपहर 12 से 3 बजे तक बालू मिट्टी में तपते रहे। वहीं वर्षा ऋतु में पहाड पर बैठकर 12 वर्ष तक श्रीराम मंत्र का जाप किया। शरद ऋतु में गंगाजल (त्रिवेणी नदी) में बैठकर रात्रि 9 बजे से प्रात: 4 बजे तक कठिन साधन करते रहे।

Today's Triveni dham formed from the confluence of three streams

पतस्याकाल में उपवास-मौन रहना आदि कठिन व्रतादि का पानल करते रहे। महाराजश्री ने त्रिवेधीधाम में गद्याभिषेक विक्रम संवत 2028 में हुआ। वहीं काठिया खाक चौक ब्रह्मापीठ डाकोर धाम का गद्याभिषेक ब्रह्मपीठाधीश्वर के पद पर 4 दिसंबर 1998 को हुआ। काठिया नगर डाकोर खाक चौक और त्रिवेणीधाम खालसा की स्थापना 25 अगस्त, 2003 में नासिक महाकुंभ में हुई। नारायणदास जी ने शिक्षा के लिए बहुत कार्य किए। उन्होंने विद्यालयों, अस्पताल और प्राचीन मंदिरों का निर्माण, गौशाला, संस्कृत विश्वविद्यालयों का निर्माण कराया। पिछले साल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने महाराज श्री को पद्मश्री से सम्मानित किया था। महाराज श्री का 18 नवंबर, 2018 को देहांत हो गया था। इसके बाद राम रिछपाल दास जी को त्रिवेणी धाम के और राम रतन दास जी महाराज को डाकोर धाम व अयोध्या धाम के प्रमुख संत बनाया गया है।

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